Ghar Ghar Me Nirali Jyoti
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घर-घर में निराली ज्योति
घर-घर में निराली ज्योति जले।
घर-घर में निराली, सुख-शान्ति देने वाली ज्योति जले॥
ज्ञान यज्ञ हम ऐसा रचायें, पावन दीप अखण्ड जलायें।
नवयुग की, उषा की लाली, उषा की लाली फैल चले॥
घर-घर में निराली ज्योति जले॥
हों हम सब आचार परायण, घर-घर में प्रगटें दैवी गुण।
आधि-व्याधि, हर लेने वाली, हर लेने वाली प्रीति पले॥
घर-घर में निराली ज्योति जले॥
जन-मन के कल्मष धो डालें, स्वार्थ नहीं परमार्थ सम्हालें।
हो नन्दन, वन-सी हरियाली, वन-सी हरियाली,गगन तले॥
मानें सब जप-तप की गरिमा, जानें सब उस प्रभु की महिमा।
बन जिसकी, बगिया के माली, बगिया के माली, हम निकलें॥
घर-घर में निराली ज्योति जले॥
मुक्तक :-
अगर चाहते हो बने स्वर्ग धरती तो,
संकल्प तुमको उठाने पड़ेंगे।
असुरता की छाई सघन कालिमा में,
तुम्हें प्राण तिल-तिल जलाने पड़ेगें।।
सुलगती है धरती उठो प्रज्ञापुत्रों,
कहीं से सजल मेघ लाने पड़ेंगे।
दीपयज्ञ मनाने बढ़ो शिल्पियों अब,
ज्ञान के दीप घर-घर जलाने पड़ेंगे।


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