Hume Phir Se Dhara Par
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हमें फिर से धरा पर

हमें फिर से धरा पर, ज्ञान की गंगा बहानी है।
जगत विख्यात भारत के, सपूतों की कहानी है॥
विवेकानन्द से जग ने, नवल आध्यात्म पाया था।
कि सोया कर्मदर्शन, रामतीरथ ने जगाया था।
जला सकती न आग इन्हें, डुबा सकता न पानी है॥
निशा में उर्वशी को माँ कहे, इस भूमि का अर्जुन।
निरख रमणी शिवा का, मातृ भावों से भरा था मन।
यही निष्ठा पुन: सबके, चरित्रों में जगानी है॥
हुई है धन्य जिनके त्याग से, स्वातन्त्र्य बलिवेदी।
भगतसिंह और नेताजी, कि जिनके स्वर गगन भेदी।
खुशी से प्राण देना ही, शहीदों की निशानी है॥
वही है वीर जो निज ध्येय को, हर मूल्य पर पाये।
पराक्रम वह कि जिससे, काल की गति भी ठहर जाये।
पराक्रम इन्द्र है शिव है, कि भैरव है भवानी है॥
मुक्तक-
प्रगति पथ पर ध्वजा नूतन, सदा अध्यात्म ने बाँधी।
इसी की शक्ति लाती है, सदा जनक्रान्ति की आँधी॥
धरा पर राज्य की ताकत, गिरा सकती है एटमबम।
नहीं पैदा वो कर सकती, विवेकानन्द और गाँधी॥


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