Langh Chala Sari Simayen
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लाँघ चला सारी सीमाएँ
लाँघ चला सारी सीमाएँ-तोड़ चला जंजीर रे।
सारे बन्धन तोड़ हुआ, यह मनवा मस्त फकीर रे॥
हमने घर परिवार न छोड़ा-स्वजनों का भी प्यार न छोड़ा।
जिसका ऋण है जनम-जनम का-वह सारा संसार न छोड़ा॥
अपनी जैसी लगी हमें तो-सबके मन की पीर रे॥
क्षुद्र स्वार्थ से नाता तोड़ा-रिश्ता सारे जग से जोड़ा।
श्रेष्ठï लोकमंगल के पथ पर-हमने हर चिन्तन है मोड़ा॥
जनहित के कारण अब तो-बस साधन हुआ शरीर रे॥
आडम्बर न सुहाता हमको-नहीं प्रदर्शन भाता हमको।
धरतीपुत्रों के पद रज कण-हैं पावन सुखदाता हमको॥
चन्दन सी इस मातृभूमि की-माटी बनी अबीर रे॥
सज्जनता को-नमन करेंगे-दुश्चिन्तन का दमन करेंगे।
जीवन भर जन सेवा में हम-गुरुवर का अनुगमन करेंगे॥
संस्कृति की रक्षा को आये-बन सच्चे युगवीर रे॥
मन में संवेदना भरेंगे-मुख से शीतल वचन झरेंगे।
जप-तप तीरथ भले न हों पर-हम सेवा साधना करेंगे॥
हर दुखियारे का आँसू है-पावन गंगा नीर रे॥
मुक्तक-
जब तक सुविधा में रस देखा-जीता था मजबूरी में।
जब मन ने पर पीर बँटायी-रहता मस्त फकीरी में॥


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