Chalo Gurudev Ke Sapne
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चलो गुरुदेव के सपने
चलो गुरुदेव के सपने, सजाने की शपथ ले लें।
सुखी सुरधाम-सी वसुधा, बनाने की शपथ ले लें॥
उठाकर हाथ में माटी, कि जैसे दक्षिणेश्वर की।
शपथ ली देश भक्तों ने, न चिन्ता की कभी सिर की।।
यहाँ हम भी सृजन संकल्प लेते हैं, निभायेंगे।
गहन दुष्वृत्तियाँ जग से, मिटाने की शपथ ले लें॥
जहाँ हों रूढिय़ाँ फैली, बहुत गहरा अँधेरा हो।
न जिनने आज तक देखा, कभी उज्ज्वल सवेरा हो॥
हृदय में स्नेह भरकर ज्योति लेकर, ज्ञान की स्वर्णिम।
स्वयं जलकर धरा को, जगमगाने की शपथ ले लें॥
पताका देवसंस्कृति की, स्वयं हर देश में लेकर।
दवा हर रोग की गुरु के, सहज सन्देश में लेकर॥
नगर औ गाँव में, घर में, डगर के बीच जायेंगे।
अलख गुरुदेव का घर-घर, जगाने की शपथ ले लें॥
भयंकर आग फैली है, जरा सी देर घातक है।
हवा बिल्कुल विषैली है, जरा सी देर घातक है॥
इसी से लोकसेवा में, लगायेंगे समय अपना।
पुन: इस विश्व वसुधा को, सजाने की शपथ ले लें॥
धरा का हर सुमन महके, यहाँ इतना समय देंगे।
सृजन की आग फिर भडक़े, यहाँ इतना समय देंगे।
न दे पाये समय तो, लोकमंगल के लिए अपने।
स्वयं प्रतिभा व धन साधन, लगाने की शपथ ले लें॥
मुक्तक-
युगदृष्टा ने देखा सपना, हम उसको साकार करेंगे।
उनकी दिव्य प्रेरणाओं का, जन-जन में संचार करेंगे॥
इस वसुधा के आँगन में अब, टिक न सकेगा दुष्ट अँधेरा।
ज्ञानक्रान्ति के सूर्याेदय से, आयेगा अब नया सवेरा॥


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Duration : 6:18