Rishiyo Ke Tap
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ऋषियों के तप त्याग
ऋषियों के तप त्याग तेज गुण, मानव धर्म महान् की।
भूली हुई कहानी फिर से, याद करो बलिदान की॥
जिस धरती को धर्म का सूरज, देता सदा प्रकाश है।
जिस धरती को कर्म और कौशल, पर ही विश्वास है॥
जहाँ गुणों का सद्भावों का, हरदम रहा निवास है॥
जिस धरती ने मानवता की, फैलाई मृदुहास है।
वह है भारतवर्ष कि जिसने, ज्योति जगायी ज्ञान की॥
मुनि वशिष्ठ ने परशुराम ने, राजतन्त्र का गठन किया।
विश्वामित्र भगीरथ ने था, नयी सृष्टि का सृजन किया॥
ऋषि-मुनियों ने ज्ञानदान हित, सारे जग में भ्रमण किया।
विश्ववन्द्य कहलाये इनको, सारे जग ने नमन किया॥
वही भूमिका फिर बननी है, ऋषियों की सन्तान की॥
हम भी पूत उसी जननी के, आज हमारी है बारी।
करना है कल्याण विश्व का, आज करें वह तैयारी॥
नये सृजन के लिए बढ़ें अब, शक्ति झोंक दें हम सारी।
ज्वाला बनकर धधक उठे यह, नये सृजन की चिनगारी॥
हमको ही लिखनी है फिर से, कथा नये निर्माण की॥
मुक्तक-
देवभूमि की ओ सन्तानों-पहचानों फिर अपने को॥
पूर्ण करो तुम अब इस युग के, भारत माँ के सपने को॥
शंकर, ज्ञानेश्वर, गौतम की, आत्मा तुम्हें बुलाती है॥
सीता, अनसुईया, दुर्गा की, परम्परा अकुलाती है॥
Remember The Tenacity Of Indian Saints..


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