Seekh Na Paye Chadar
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सीख नहीं पाये चादर

सीख नहीं पाये चादर, ओढऩे का ढंग रे।
मैली चादर पर कैसे, चढ़ पाये रंग रे॥
हमें मिली चादर उजली, मैली कर डाली।
स्रजधर गये हमने, उतनी कालिमा लगा ली।
मैला अब अंतरंग है, मैला बहिरंग रे॥
आओ, हर कल्मष मन का, सेवा से धो लें।
सबको अपना लें मन से, हम सबके हो लें।
सेवा है सच्ची पूजा, सेवा सत्संग रे॥
सबका दु:ख दर्द बटायें, अपना सुख बाँटें।
हृदय-हृदय की खाई को, हँसकर हम पाटें।
किये नहीं तीरथ चाहे, गये नहीं गंग रे॥
परहित में अपने साधन, समय हम लगायें।
मन का हर मैल धुले फिर, पुण्य हम कमायें।
हर कोना हो फिर उजला, उजला हर अंग रे॥
निर्मल आचरण बनेगा, चमकेगा चिन्तन।
बहुत-बहुत चौंड़ा होगा, भावों का आँगन।
नहीं कभी होगी मन की, गली कहीं तंग रे॥
जीवन में शेष रहेगी, फिर नहीं निराशा।
पलभर आलस्य न होगा, फिर कहीं जरा सा।
होगा उत्साह अनोखा, नित नयी उमंग रे॥

मुक्तक :-
पंच तत्व ही रूई अनोखी, बड़े यतन से धुनी गयी।
प्राण मिलाकर, धागे बँटकर, बड़े प्रेम से बुनी गयी।।
रंग सुनहरा इस पर चढ़ता, तो सौभाग्य निखर आता।
लेकिन रंग चढ़ेगा कैसे, कोई समझ नहीं पाता।।
जीवन की चादर को प्राय:, सब ही मैली कर लेते हैं।
मन मन्दिर में पड़े विकार का, कूड़ा करकट भर लेते हैं॥
जन सेवा के गंगा जल से, जीवन की चादर धो पायें।
तो पावन उजली चादर से, देवों का मन हर लेते हैं॥


Comments

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rishi
2014-09-15 14:46:30
i have to required to this mp3.
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Duration : 9:15