Kothari Man Ki
Pragya Geet Mala - All Songs

कोठरी मन की
कोठरी मन की सदा रख साफ बन्दे।
कौन जाने कब स्वयं प्रभु आन बैठे॥
तुम बुलाते हो उसे यदि भावना से।
कौन जाने कब निमंत्रण मान बैठे॥

दर्द यदि उभरे कभी मन में तुम्हारे।
खर्च मत करना बिना सोचे विचारे॥
दर्द से रिश्ता सदा प्रभु का रहा है।
नाम करूणा सिंधु ही उसका रहा है॥
एक भी आँसू न कर बर्बाद बन्दे।
कौन जाने कब समन्दर माँग बैठे॥

चाह हो तो राह बन जाती गगन में।
चाह से उत्साह भरता मन बदन में॥
चाह पूरी हो यही सब माँगते हैं।
किन्तु उसका मर्म कब पहचानते हैं॥
स्वर्ग भूतल पर गढ़े कैसे विधाता।
नर्क में ही सुख मनुज यदि मान बैठे॥

रोज मानव कर रहा दु:ख की शिकायत।
दुष्टता की कर रहा फिर क्यों हिमायत॥
दु:ख हरेंगे प्रभु स्वयं अवतार लेकर।
मानवी पुरुषार्थ को पर साथ लेकर॥
सूर्य उगकर भी भला क्या हित करेगा।
आँख से पट्टी अगर हम बाँध बैठे॥

माँगने की रीति सी कुछ चल पड़ी है।
कृपणता से प्रीति सी कुछ हो चली है॥
क्यों नहीं परमार्थ पथ का मान रखते।
क्यों नहीं इन्सानियत की शान रखते॥
है तुम्हें दाता विधाता ने बनाया।
क्यों अरे खुद को भिखारी मान बैठे॥

मुक्तक :-
इष्ट से रिश्ता अगर सच्चा बनाना चाहते हैं।
और जीवन में विमल अनुदान पाना चाहते हैं।।
तो शिकायत के स्वरों में बात करना छोड़ दें।
और निज अंत:करण को दिव्यता से जोड़ लें।।


Comments

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richa
2013-11-13 20:56:12
every word of this song is heart touching
richa
2013-11-13 13:24:31
every word ofthis song is heart touching
neha mishra
2012-09-24 18:36:02
this is very graceful song and heart touching song.
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Duration : 14:37