Rang Basanti Prabha Kesari
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रंग बसन्ती प्रभा केशरी
रंग बसन्ती, प्रभा केशरी, शान्तिकुञ्ज के कण-कण में।
आते ही भर जाती है यह, लहर रंग की हर मन में॥
जीवन लगा तपश्चर्या में-पूज्यपाद श्री गुरुवर का।
मिशन बनाया ऐसा सारे-जग को रूप दिया घर का॥
व्यक्ति मात्र को बना दिया, पारंगत जीवन के रण में॥
जीवन जीने की शुचि कला-सन्त ऋषियों ने विकसायी।
और बुलाकर पास करोड़ों-को वह विद्या सिखलाई॥
कहा बन्धु! अध्यात्म श्रेष्ठ है-रहो न लिप्त सिर्फ धन में॥
रंग बसन्ती है कि ग्रहण हम-करें सद्ïगुणों की आभा।
सासें ममता के नभ में लें-तजें कुटिलता की दावा॥
लोकहितों का रंग बसन्ती-जागे फिर से जन-गण में॥
चोला था बासन्ती रंग का-भगत सिंह की फाँसी का।
नाम लिखा इस रंग ने ही-लक्ष्मीबाई औ झाँसी का॥
आज बसन्ती वस्त्र पहन सब-लगे नव्य युग सर्जन में॥
जल उपवास, अस्वाद व्रतों की-आभा बासन्ती रंग में।
बन प्रकाश स्वर्णिम फूटी थीं-इस योगी के अंग-अंग में॥
यह पावनता ही बिखरी है-शान्तिकुञ्ज के आँगन में॥
मुक्तक-
वह उपचार किया गुरुवर ने, जीवन का सब मैल धुल गया।
तन, मन, जीवन रँगा अलौकिक, बासन्ती उल्लास खिल गया॥


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