Jo Apna Kartavya
Pragya Geet Mala - All Songs

जो अपना कत्र्तव्य
जो अपना कत्र्तव्य उसी पर, न्यौछावर हो जाना।
ये मनुष्य तेरे जीवन का, कुछ भी नहीं ठिकाना।
बनो आलसी तो है जीना, कर्म करो तो जीना।
अकर्मण्य आलसी बनकर, क्या मुर्दे कहलाना।।
यौवन पाया धन-जन पाया, सभी वृथा है पाना।
अगर नहीं दुनियाँ के हित में, अपना हित पहचाना।।
क्या लाये थे क्या ले जाना, खाली आना जाना।
यहीं रहा सब यहीं रहेगा, क्यों फिर मोह लगाना।।
आयेगा जब काल तभी यह, सब कुछ छीना जाना।
क्यों न जगत के सेवक बनकर, धीर वीर कहलाना।।
खेलो खेल खिलाड़ी बनकर, छोड़ो बैर भजाना।
आना-अपना खेल खेलकर, हँसकर छोड़ो बाना।।
मुक्तक :-
पंच तत्वों का खिलौना, कब न जाने टूट जाये।
प्राण का सम्बन्ध तन से, कब न जाने छूट जाये।।
क्षण भंगुर यह देह है, व्यर्थ रहा क्यों जोड़।
परमारथ पर ध्यान दे, स्वार्थ भावना छोड़।।
क्षण, क्षण, क्षण, क्षण बीतते, बीता जाय।
क्षण, क्षण का उपयोग कर, बीता क्षण न आय।।


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